Thursday, April 27, 2017

North East Tour (Part-7) : Thoubal to Imphal Journey and "Eromba" A Manipuri Dish


थौबल से वापस इम्फाल लौटने की घडी आ चुकी थी, जिस तरह हम थौबल आये थे उसी तरह वापस इम्फाल के लिए निकल पड़े, कुछ किमी की दूरी तय करने के बाद हमारे पास दो विकल्प थे एक तो जिस रास्ते हम आये थे उसी रास्ते वापस इरिलबुंग होते हुए इम्फाल जाए या फिर उस राष्ट्रीय राजमार्ग पे चलते रहे जो इम्फाल को मोरे (वर्मा सीमा) से जोड़ती है, हमने नया रास्ता चुना ताकि इम्फाल के दूसरे भाग को भी देखा जा सके भले चलते– चलते ही सही, अबुंग कि लाइव कमंट्री फिर शुरू हो गयी थी, वो बताता जा रहा था और मैं सुनता जा रहा था, रास्ते में हमे कुछ बस्तियां नज़र आयी, अबुंग ने कहा ये सारी बस्तियां अवैध हैं और राजनीतिक संरक्षण के चलते इनका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता, ये आउटर इम्फाल का वह भाग है जहाँ सबसे ज्यादा बंद व दंगे होते हैं, कुछ और किमी कि दूरी तय करने के बाद हमने आउटर इम्फाल का ही एक छोटा सा टाउन क्रॉस किया अबुंग ने उसके बारे में बताते हुए कहा कि यह मणिपुर का रहस्यमयी इलाका है जहाँ चोरी का सामान पता नही कैंसे समा जाता है, यहाँ पुलिस भी आने में कतराती है और आपकी गाड़ी चंद मिनटों में यहाँ से गायब हो सकती है |  ये सारी बातें अबुंग चलते-चलते बताता जा रहा था और साथ ही वो मुझे उन रास्तों को भी इशारों से बता रहा था जिनसे हम कम से कम समय में इरिलबुंग पहुँच सकते थे |

इम्फाल में मुझे और भास्कर दा को दो अलग-अलग घरों में भोजन के लिए जाना था, भास्कर दा आशा रानी दीदी के घर भोजन के लिए जाने वाले थे लेकिन भास्कर दा उनके घर का रास्ता नही जानते थे और हम चारों में स्थानीय रास्तों कि जानकारी अबुंग से ज्यादा किसे होगी ये बताने वाली बात नही है इसलिए अबुंग मुझे साथ लेकर सबसे पहले भास्कर दा को आशा दीदी के घर तक छोड़ने गया, वैसे भास्कर दा इतनी जल्दी में थे कि वो हम से पहले निकल गए थे लेकिन जा पहुंचे कहीं ओर, मैं और अबुंग रास्ते में उनका इंतज़ार करते रहे, उनका फ़ोन लगाते रहे लेकिन नेटवर्क प्रोब्लम के कारण बात नही हो पाई तो हम सीधे आशा दीदी के घर जा पहुंचे, थोड़ी देर बाद जैसे तैसे भास्कर दा भी वहां आ पहुंचे, आशा दीदी भी मेरे से भोजन करने की जिद करने लगी तो मैंने आकर खाने को कहा, फिर अबुंग मुझे लेकर निकल पड़ा भाभी के माइके वाले घर में जहाँ उनकी छोटी बहन हमारा इंतज़ार कर रही थी, जो अपने माँ पिताजी के साथ इम्फाल में रहती हैं, वैसे तो वो दिल्ली में ही रहती थी लेकिन पिछले महीने ही दिल्ली से वापस मणिपुर में आकर अपना काम कर रही हैं, वो पेशे से अर्केटेक्ट हैं | भाभी शादी के बाद  से भैया के साथ सहारनपुर में रहती हैं और दोनों दांतों के डॉ हैं | अपनी डाक्टरी कि पढाई के दौरान ही दोनों का प्यार परवान चढ़ा और एक दूसरे के साथ विवाह-सूत्र में बंध गए, उनके दो बच्चे हैं | खैर 12 बजे के बदले हम डेढ़ बजे घर पे पहुँच ही गए, भूख भी जोरों कि लगी थी, भाभी कि बहन से में आज पहली बार मिल रहा था, लेकिन हम फेसबुक और फ़ोन से एक दूसरे से जुड़े रहे हैं, दिल्ली में कई बार मिलने की सोची पर मिलना नही हो पाया था, मेरे उनके घर में पहुँचते ही भाभी के मम्मी-पापा मेरे से मिलने आ गये, मम्मी से मेरी कम ही बात हो पाई लेकिन पापा से काफी बात हुई, इम्फाल में हम जिनके घर में रुके थे वो उनसे भलीभांति परिचित थे, मेरे से हिंदी में बात हो रही थी और अबुंग से मणिपुरी में, चाय के लिए हमने मना कर दिया था तो पहुँचने के कुछ देर बाद ही हमारे लिए भोजन परोसा जाने लगा, दाल, चावल, आलू गोभी कि सब्जी, बीन्स कि सब्जी, चिकेन और मछली कढ़ी और इरोम्बा से खाने की मेज पट चुकी थी, केवल रोटी कि कमी थी वरना पूरा खाना लगभग उत्तर भारतीय ही था बस इरोम्बा को छोड़ दें तो..

इरोम्बा मणिपुर का प्रमुख, प्रसिद्ध व सबसे पसंदीदा व्यंजन है, किसी भी मणिपुरी के सामने इसका जिक्र करो तो स्वाभाविक ही उसके मुह में पानी आ जायेगा, लोगों से सुनी बातों के आधार पर इस व्यंजन से मेरा परिचय तो था लेकिन आज इसे चखने का पहला मौका भी था | चूँकि मै उत्तर भारत से हूँ तो हमारे लिए इसे बनाते वक्त इस बात का बहुत ध्यान रखा गया था और यही वजह थी कि इरोम्बा की सबसे मुख्य सामग्री नगारी यानि किण्वित मछली (fermented fish) को इससे दूर रखा गया था और हमारे लिए भाभी कि मम्मी ने खुद शुद्ध शाकाहारी इरोम्बा बनाया गया था, भाभी कि बहन को अंदेशा था कि मुझे नगारी कि खुशबू अच्छी नही लगेगी इसलिए उन्होंने इसे डालने को मना कर दिया था, मैंने एक कटोरी में थोडा सा इरोम्बा लिया और खाने के साथ थोडा-थोडा करके खाने लगा, स्वाभाविक था कि ये मेरे स्वादअनुसार तो नही था लेकिन ये इतना भी बुरा नही था कि मैं इसे खा न सकूँ, सबकी अपनी–अपनी खान-पान कि शैली होती है और हमे उसको पूरा सम्मान देना चाहिए, इधर मैं एक कटोरी इरोम्बा से ही छक गया था उधर अबुंग इरोम्बा को तबियत से पैले जा रहा था, मै भी खुश था कि उसने मेरे बदले का इरोम्बा भी चट कर दिया था, वरना उसे फेंकना पड़ता क्योंकि मणिपुरी लोग खाने को एक पहर से दूसरे पहर के लिए बचाके नही रखते और खाना फेंकना मुझे बिलकुल भी पसंद नही है |


"Eromba" A Manipuri Dish, Photo Source-Google
इरोम्बा कि सामग्री व बनाए जाने कि विधि – असली इरोम्बा बनाने के लिए थोडा उबले आलू, उबली हुयी हरी सब्जियां जैसे भिन्डी, बीन्स, सेम आदि के साथ नगारी यानि किण्वित मछली (fermented fish) और सुखी लाल मिर्ची कि जरूरत होती है, इन सबको एक बर्तन में एक साथ मसलकर मिलाया जाता है जिससे उसकी चटनी बन जाती है और यदि नकली यानि शाकाहारी इरोम्बा बनाना है तो इससे केवल मछली हटा दो तो शाकाहारी इरोम्बा बन जायेगा | इरोम्बा में नगारी का इस्तेमाल महत्वपूर्ण होता है और इसको बनाए जाने कि भी अपनी एक अलग ही विधि है, नगारी मणिपुर व पूर्वोत्तर राज्यों का एक महत्वपूर्ण भोज्य उत्पाद है जोकि मछली को धुप में बिना नमक के सुखाया जाता है, जिससे मछली को घर में लम्बे समय तक रखा जा सकता है, इसको बनाये जाने कि विधि थोड़ी जटिल और स्वाद अनुसार पूर्वोत्तर राज्यों में अलग-अलग है, नगारी 10 से 15 दिन में तैयार होती इसलिए अभी में इसकी विधि में नही जाना चाहता............................|

Fermented Fish, (Photo Source - Google)
खाना खाके हमारा पेट भर चुका था और आलस हम पर हावी हो रहा था, लेकिन आज ही हमारा मोइरांग जाने का भी प्रोग्राम बन गया था, मोइरांग जाने कि खबर सुनकर भाभी कि बहन ने मुझे वहां लोकटक लेक घूम आने को कहा मैंने भी कहा ठीक है, खाना खाने के बाद आधे घंटे और बैठने के बाद मैंने और अबुंग ने वहां से विदा ली, जाते-जाते भाभी की बहन ने हमे आंवला और जैतून के ताज़ा अचार के कुछ पैकेट थमा दिये जोकि कुछ दिन पहले ही बनाये गये थे और खाने के लिए एकदम तैयार थे | वहाँ  से निकलकर हम सीधे आशा दीदी के घर जा पहुंचे जहाँ भास्कर दा हमारा इंतज़ार कर रहे थे, वहां उनके एक मित्र कार लेकर आने वाले थे जो हमे मोइरांग लेके जाने वाले थे, आशा दीदी के घर पहुँचने के कुछ ही देर बाद भास्कर दा के मित्र भी आ गए थे, उनसे मेरी मुलाकत मणिपुर में पहले ही दिन एअरपोर्ट पर हो चुकी थी इसलिए मुझे उनसे परिचय करने कि अलग से कोई जरूरत नही पड़ी क्योंकि भास्कर दा ने उनको मेरे बारे में गुवाहटी एअरपोर्ट पर ही बता दिया था और मणिपुर एअरपोर्ट में जब हम मिले तो वो पहले ही जिद कर चुके थे कि वो मुझे इम्फाल और मोरे घुमाने ले जायेंगे लेकिन हमने समय कम होने कि वजह से उनको मना कर दिया था लेकिन वो फिर भी न माने और आज हमे मोइरांग लेके जा रहे थे, वैसे अंधे को क्या चाहिए था..........  समय कम था इसलिए हम इम्फाल से सीधे मोइरांग के निकल पड़े ........................| शेष अगली पोस्ट में ............

इम्फाल से मोइरांग और मोइरांग के लोगों के बीच का अनुभव मैं आपसे अपनी अगली पोस्ट में साझा करूँगा | जिन्होंने अभी तक मेरी मणिपुर यात्रा कि पूर्व में लिखी पोस्ट को नही पढ़ा है वो नीचे दिये लिंक पर क्लिक करके इन पोस्ट को शुरुआत से पढ़ सकता है, --------

Thursday, April 13, 2017

रहस्य द लैंड ऑफ़ ज्वेल (The Land of Jewel) नाम का और इरिलबुं से थौबल तक का सफर

आज मणिपुर में हमारा तीसरा दिन था, हम थोडा जल्दी उठ गए थे क्योंकि आज हमारा घुमने का प्लान था, इसलिए समय से नहा धोकर तैयार हो चुके थे, आज मेरी किस्मत भी अच्छी थी जो मुझे नहाने के लिए गर्म पानी मिल गया था, कल पूरे दिन छींके आने से अबुंग को लगा कि मुझे ठन्डे पानी में नहाने के कारण सर्दी लग गयी तो सुबह जैसे ही में बाथरूम कि और गया अबुंग पता नही कहाँ से एक बाल्टी में गर्म पानी लेकर आ गया था | सुबह 9 बजे से पहले ही नहा धोकर मै और भास्कर दा घर से निकलने के लिए तैयार थे, अब हम इंतज़ार कर रहे थे उस शख्स का जो हम को ले जाने के लिए गाड़ी लेकर आने वाले थे | घर से निकलने में थोडा वक़्त लगेगा जानकर मैंने सोचा क्यों न थोड़ी देर सोशल मीडिया में अपनी इम्फाल यात्रा के कुछ फोटो ही अपलोड कर लूँ, कल मैंने जो फोटो लीं थी उनमे से मैंने कुछ फोटो को मैंने छांट तो लिया लेकिन अपलोड करते समय एल्बम के नाम को लेकर अटक गया, मै एल्बम का नाम कुछ यूनिक रखना चाहता था जो मणिपुर को प्रस्तुत करता हो और कॉमन भी न हो, जिससे लोगों के मन में इसके प्रति रूचि जगा सके, काफी देर सोचने के बाद जब दिमाग काम नही किया तो मैंने भास्कर दा से पूछा कि जैंसे अरुणाचल को The Land of Rising Sun कहते हैं वैसे ही मणिपुर का भी तो कोई ऐसा नाम, उपनाम होगा, तो उन्होंने कहा कि हाँ ज्वेल करके कुछ है, बस मुझे हिंट मिल गया था तो मैंने Google बाबा कि मदद से मणिपुर का उपनाम ढूंड ही लिया.... The Land of Jewel A Jeweled land” मणिपुर को The Land of Jewel कहने के पीछे का कारण है इसका अंडाकार भू-भाग जोकि चारों ओर से 9 पहाड़ियों ने घिरा हुआ है, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जब मणिपुर गए तब उन्होंने इसको The Jewel of India' कहा था तब से इसे इस नाम से भी जाना जाता है, मैंने फेसबुक में Jewel of India (The Land of Jewel) नाम से एल्बम बनाई और कुछ फोटो उसमे अपलोड कर दिये |

इधर समय 10 के पार हो चुका था और उन महाशय की कोई खबर नही थी, शायद वो कहीं अटक गए थे, जोकि यहाँ कोई बड़ी नही थी, वैसे भास्कर दा ने विकल्प ढूढने शुरू कर दिये, अबुंग और विसेश्वर दा ने तय किया कि हम दोनों को दो टू-वीलर से ले जाया जायेगा, मैने अबुंग के साथ बाइक पर कब्ज़ा जमा लिया और भास्कर दा स्कूटी पे एक और नौजवान साथी संतोष के साथ चल पड़े, मै बहुत समय से मोटर साइकल से कहीं गया नही था तो मै काफी उत्साहित था, 11 बजे के लगभग हम लोग घर से निकले, घर से निकलते ही सबसे पहले अबुंग ने इरिलबुंग बाज़ार में बाइक को सड़क किनारे स्टूल के पास रोका जिसके ऊपर पेट्रोल से भरी कुछ बोतलें रखी थी, मै समझ गया कि वो बाइक में तेल भरवाना चाहता है, बाइक खड़ी कर वो सीधे दुकान के अन्दर गया और शायद उसने तेल का मूल्य पूछा फिर बाहर आ कर उसने हमे बताया कि आज पेट्रोल सस्ता है इसलिए दो लीटर डाल देते हैं अबुंग ने 110 के हिसाब से चार बोतल 440 में खरीद कर दोनों गाड़ी में दो-दो बोतल उड़ेल दी, मणिपुर में पेट्रोल इतना सस्ता क्यों था ये जानने के लिए आपको मेरी पुरानी कुछ पोस्ट को पढना पड़ेगा जिनका लिंक लेख के अंत में रहेगा | गाड़ियों का पेट भरने के बाद हम अपनी मंजिल कि ओर बढ़ चले, मुझे नही पता था कि हम जा कहाँ रहे थे, आज अबुंग सारथी था और मै सवारी |


बाइक चलाते वक़्त अबुंग अपनी धुन में था और मैं अपनी, बीच-बीच में वो अपनी धुन से बाहर निकल कर किसी ओर अपने हाथों से इशारा करके उस जगह या वस्तु के बारे में बताते हुए बाइक चला रहा था और कभी-कभी मैं रास्ते कि ख़ामोशी को तोड़ते हुए अबुंग को कुछ पूछ लेता था, चलते-चलते अबुंग ने कहा तामो (बिसेश्वर दा) का ससुराल आ गया, मुझे लगा कि शायद हम यहाँ थोड़ी देर रुकेंगे लेकिन हम आगे बढ़ गए, मैंने अपना मोबाइल फ़ोन निकालकर फेसबुक लाइव कर दिया था ताकि मेरे वो मित्र जो पूर्वोत्तर से दूर हैं वो भी मेरे साथ यहाँ कि जिंदगी कि कुछ झलक देख लें, सड़क भले ही दोनों किनारों पर बांस व लकड़ी के घरों से घिरी हुई थी लेकिन वहाँ एक आलौकिक शांति छाई थी, लगभग हर घर के पास एक पानी का तालाब था जोकि पूर्वोत्तर में जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग होता है, तालाब के पानी से कुछ महिलाएं नहा रही थीं, कोई कपड़े धो रहा था तो कोई बर्तन, दो चार लोग बांस से बने घर के बाड़े के पास खड़े होकर आपसी बातचीत में व्यस्त थे | हमारे सामने कि सड़क से आते हुए कुछ लोगों को देखकर अबुंग ने कहा कि शायद कोई मर गया है ये लोग उसका क्रियाकर्म से लौट रहे हैं, कुछ दूर जाने पर उसका अंदाज़ा सटीक निकला लेकिन मुझे नही पता कि अबुंग ने किस आधार पर ये बात कही थी | थोडा और आगे जाने पर अबुंग ने इशारा करते हुए कहा नीरज भाई यहाँ से मेरा घर पास है ये मेरे गाँव का रास्ता है, इतने में भास्कर दा स्कूटी में रेस देते हुए हमारे बगल में आके मुझे कहने लगे नीरज अबुंग यहाँ से इरिलबुंग तक कई बार साइकल से आता था और जब कोई अलगाववादी या कोई और संगठन बंद कि घोषणा कर देता था तो ये पैदल ही चल देता था, थांग-टा के प्रति इसका समर्पण गजब का है |

10-12 किमी चलने के बाद भी जब गाड़ी के चक्के नही रुके तो मैंने पूछ ही लिया कि हम जा कहाँ रहे हैं फिर मुझे पता चला कि हम थौबल जा रहे है जो एक छोटा सा टाउन है और थौबल जिले का मुख्यालय है, यहाँ भास्कर दा को अपने कुछ मित्रों से मिलना था और मै घर में बैठकर क्या करता इसलिए इनके पीछे मै भी लद गया था |

थौबल जाते समय रास्ते में हमे छोटी–छोटी पहाड़ियों पर अनानस कि खेती दिख रही थी और मुझे बताया गया कि यहाँ का अनानस का स्वाद बेहतरीन है और शायद भारत का ये इकलौता राज्य है जहाँ किसी फल को केन्द्रित कर उसके नाम से ‘अनानस उत्सव’ (Pineapple Festival) मनाया जाता होगा | जिस युद्ध के कारण पौना ब्रजबासी अमर हो गये थे वो खोंगजोम का युद्ध इसी जिले में लड़ा गया था, लगभग 15 किमी चलने के बाद जब हम मुख्य सड़क से मिले तो मुझे पता चला कि जिस सुनसान सड़क से हम आ रहे थे असल में वह इम्फाल का पिछला भाग था, मुख्य सड़क में आने के बाद शहर कि वही भीड़-भाड़ भरी दौड़-भाग यहाँ भी महसूस हो होने लगी थी, इस सड़क पर चलते-चलते हम मोरे यानि बर्मा तक जा सकते थे लेकिन हम केवल थौबल तक ही जाने वाले थे, सड़क किनारे कुछ महिलाएं दुकान लगाकर सामान बेच रही थी, जिसमे लोकल सब्जियां, अनानस, अन्य फल आदि थे, हम थौबल के लिए आगे बढ़ते ही जा रहे थे, 45 मिनट का सफ़र तय करने के बाद हम थौबल के बाज़ार में पहुँच गए थे, यहाँ केवल हमे कुछ लोगों से मिलना था और यहाँ घुमने का हमारा कोई इरादा नही था और वैसे भी खोंगजोम वार मेमोरियल (इसके बारे में पढने के लिए आप मेरी इस पोस्ट पर क्लिक करें पूर्वोत्तर यात्रा: मणिपुर में पहला दिन, पौना बाज़ार और हेजिंग्पोट की तैयारियां) के अलावा जिला मुख्यालय और आस-पास में ऐसी और कोई जगह थी भी नही जहाँ जाये बिना मैं न रह सकूँ साथ ही हमारे पास समय भी कम था तो जल्दी से लोगों को मिलके इम्फाल वापस जाने कि योजना थी, मै भी यहाँ लोगों से घुलना मिलना ज्यादा उचित समझ रहा था, क्योंकि हर जगह के मनुष्य की प्रकृति भिन्न होती है जिसको समझना बेहद आवश्यक है, प्रकृति कि अपनी प्रकृति लगभग सभी जगह एक समान ही होती है भले ही उसका स्वरुप कितना ही भिन्न क्यों न हो उसके नियम एक होते हैं जिसको समझना बेहद आसान होता है शायद मेरे विचार में केवल .....खैर हम थौबल के मुख्य बाज़ार में पहुँच चुके थे, बाज़ार में हर वो आधुनिक सामान मौजूद था जो आज किसी भी तेजी से विकास कर रहे शहर के लिए आवश्यक होती है, थोडा रास्ते कि भूल-भुलैया में भटकने के बाद आखिरकार हम लोग अपने गंतव्य तक पहुँच चुके थे, जोकि एक स्कूल था और यहाँ पहुँचने से थोडा पहले ही हमे दौड़ते हुए 100-150 बच्चों कि टोली मिली थी जिसे देककर अबुंग बोल पड़ा लो हम सही जगह पहुँच गए हैं, वो इसी स्कूल के बच्चे थे और इंटरवल में धमाल करने जा रहे थे, कहाँ ? ये नही पता, हम लोग एक पब्लिक स्कूल के अन्दर दाखिल हुए, भास्कर दा को जिन महाशय से मिलना था वे स्कूल के संस्थापक व व्यवस्थापक के साथ-साथ वो एक शिक्षक भी थे, जिन्होंने अपनी मेहनत से इस स्कूल को स्थापित किया था, उनसे मिलाने के लिए हमे एक क्लास रूम में ले जाया गया जहाँ वो बच्चों को पढ़ा रहे थे, हमसे मिलने के बाद उन्होंने बच्चों से हमारा परिचय करवाकर भास्कर दा को बच्चों के साथ संवाद करने का न्योता दे डाला, भास्कर दा भी कहाँ पीछे रहने वाले थे, बिन योजना के वो कई घंटे लोगों के साथ संवाद कर सकते थे ये तो बच्चे ही थे, जितनी देर वो बच्चों से संवाद करते रहे मै वहां क्लास रूम में  मौजूद चीजों को स्कैन करने में और उनकी तस्वीरें उतारने में व्यस्त था, मेरे लिए क्लास रूम थोडा अजीब थी वो इसलिए कि यहाँ रूम में दाखिल होने के लिए दरवाजा तो था लेकिन इसके पीछे कि दीवार खुली थी, शायद नया कंस्ट्रक्शन था इसलिए क्लास रूम में केवल तीन तरफ कि दीवारें ही मौजूद थी, क्लास रूम में मेरे लिए एक और बात गौर करने वाली थी वो ये कि यहाँ लड़कों के कानों में भी कुंडल होते हैं जोकि फैशन के लिए नही बल्कि यहाँ कि संस्कृति की निशानी थी |


बच्चों के साथ आधे घंटे बात करने के बाद हम लोग क्लास रूम से बाहर निकल कर स्कूल कि अन्य क्लास रूम से रूबरू होने चल दिये, मुझे डर था कि कहीं किसी और क्लास में भी भास्कर दा को कुछ बोलने को कहा जायेगा तो ये मना तो करेंगे नही लेकिन मुझे इम्फाल में किसी को मना करना पड़ेगा जहाँ आज मेरा लंच करने का प्रोग्राम था, और वो बार-बार मेसेज करके पूछ रहे थे कहाँ पहुंचे,  लेकिन ऐसी नौबत नही आयी, लगभग 10 मिनट में हम पूरा स्कूल घूम लिए थे, स्कूल घुमने के बाद मुझे यहाँ जिस चीज़ कि कमी महसूस हुई वो थी बच्चों के लिए प्ले ग्राउंड की, वैसे यहाँ जगह कि बहुत कमी थी, केवल किताबी शिक्षा ही बच्चों के लिए पूरी नही होती इसके साथ-साथ शारीरिक शिक्षा भी उनके विकास के लिए जरूरी होती है लेकिन मुझे यहाँ इसकी कोई व्यवस्था नजर नही आ रही थी, थोड़ी देर बाद जब हमे स्कूल से थोड़ी दूर स्कूल के ही दूसरे भाग में ले जाया गया तो मुझे मेरे दो सवालों का जवाब मिल गया था पहला ये कि जब हम यहाँ आये थे तो वो बच्चे कहाँ जाने के लिए दौड़ रहे थे और दूसरा ये कि स्कूल के बच्चे कहाँ खेलते होंगे, स्कूल के इस दूसरे भाग में बहुत जगह थी जहाँ छोटे बच्चे खूब खेल सकते थे लेकिन बड़े बच्चों के लिए फिर भी मुझे कोई माकूल जगह नही दिखी रही थी, स्कूल के इस दूसरे भाग में छोटे बच्चों कि क्लास रूम थी, जब हम यहाँ पहुंचे तो बच्चों का इंटरवल टाइम था और बच्चे अपने आप में मस्त थे, कोई अपने टिफ़िन से दावत उड़ा रहा था कोई अपने दोस्तों के साथ खेलने में व्यस्त था, कुछ क्लास रूम में ही बैठकर मस्ती कर रहे थे, हमे देख कर कुछ बच्चे हमारे साथ आंख मिचोली का खेल खेलने लगे, स्कूल में बाहर से आये लोगों को देख कर अक्सर बच्चें उत्साहित हो जाते हैं, हम भी अपने बचपन में स्कूल में आये अजनबियों को देखकर उत्साहित हो जाया करते थे क्योंकि कई बार ये अजनबी अपने साथ कई अनोखी चीजें लेकर बच्चों के सामने प्रदर्शित किया करते थे और हमारे लिए ये एक खेल ही होता था जो हमे दूसरी दुनिया में ले जाते थे भले ही कुछ देर के लिए ही सही |


मेरे गले में लटका कैमरा बच्चों का ध्यान अपनी ओर खिंच रहा था, फोटोग्राफी और कैमरे के कारण वैसे तो मेरे बहुत सारे दोस्त बने हैं लेकिन आज एक ऐसी छोटी सी बच्ची मेरी दोस्त बनी जो भास्कर दा को देखकर गुस्सा हो रही थी, वास्तव में कुछ प्रोफेशन बहुत ही खुबसूरत होते हैं जो आपको दूसरों को खुश रखने का मौका देते हैं और मुझे ख़ुशी है कि उन कुछ खास प्रोफेशन में से एक प्रोफेशन से मै भी जुड़ा हूँ |



थौबल आने का हमारा मकसद पूरा हो चुका था और अब हम वापस इम्फाल जाने के लिए तैयार थे जहाँ कुछ लोग हमारा भोजन के लिए इंतज़ार कर रहे थे, थौबल से इम्फाल का सफ़र व उससे आगे का सफ़र अपनी अगली पोस्ट में लिखूंगा, तब तक आप मेरी पुरानी पोस्ट को पढ़ सकते हैं |


Friday, March 31, 2017

पूर्वोत्तर यात्रा : मणिपुर में दूसरा दिन, पीबा ले-लाँगबा (बर बर्टन) और पकोड़ो वाली दावत

 हेइजिंगपोट की रस्म से घर लौट ते वक़्त मेरे मन में एक सवाल घूम रहा था, वो ये कि इतने सारे लोग जो लड़की के घर गए थे वहां तो कुछ खाने को मिला नही तो घर में इन सबका खाना कौन बना रहा होगा ? क्योंकि सुबह से ऐसी कोई व्यवस्था तो दिखी नही, मैंने जिज्ञासा वश पूछ ही  लिया, तो भास्कर दा ने बताया कि यहाँ अन्य राज्यों कि तरह ये सब नही होता लोग अपने घर से खा-पीकर आते हैं और रस्म संपन्न होने के बाद अपने घर वापस चले जाते हैं और जब हम घर पहुंचे तो सभी लोग चाय पीकर अपने-अपने घर लौटने लगते हैं, खैर हम लोग घर के ही मेहमान थे तो हमको अपने भोजन की ज्यादा चिंता नही थी हमारे लिए घर में भोजन तैयार हो रहा था |

आज मुझे पुरी उम्मीद थी कि हमे विशुद्ध मणिपुरी खाना खाने को मिलेगा, लेकिन भोजन बनाते समय हम दो प्राणियों का इतना ध्यान रखा जायेगा ये मुझे पता न था, हम दोनों कितने शुद्ध शाकाहारी हैं ये तो मै नही बताऊंगा लेकिन हाँ भास्कर दा मुझ से ज्यादा शाकाहारी हैं इतना में जरूर कहूँगा लेकिन भोजन के मामले में मै उनसे ज्यादा उदारवादी हूँ, चूँकि भास्कर दा का इस घर में पुराना आना जाना है तो उनकी खाने कि रूचि से घर के सारे लोग परिचित थे, इसलिए भोजन से कुछ दैनिक सामग्री गायब थी जैसे मछली, सामान्यतः मणिपुरी के हर भोजन में सूखी मछली का प्रयोग होता है और यदि घर में किसी कोने में मछली युक्त भोजन बना भी तो वो हमारी थाली से कोसो दूर था, भास्कर दा के लिए मांसाहार केवल पक्षी फल यानि अंडे तक ही सीमित है जोकि पूर्वोत्तर में पूर्वोत्तर के व्यक्ति के प्रति एक रहस्य का विषय भी है |

हमे भोजन के लिए आमंत्रित किया गया, भोजन कक्ष में पहुंचते ही जब मेरी नज़र दो विशिष्ट बड़ी-बड़ी भोजन से परोसी गयी थालियों पर पड़ी तो मै थोडा सकपका गया था, वो इसलिए कि उन दोनों थालियों में भात कि जो मात्रा थी वो मेरे दो दिन के भोजन के लगभग की थी और यदि ये थालियाँ मेरे और भास्कर दा के लिए परोसी गयी है तो फिर तो खा-खा के मर गए आज, लेकिन शुक्र मनाओ कि उन दो थालियों के साथ ही सामान्य आकार कि दो और थालियाँ थी जो हम दोनों के लिए परोसी गयी थी और जो दो बड़ी थालियां थी उनमें चार लोगों के लिए खाना परोसा गया था, मणिपुर में एक बड़ी सी थाली में दो-तीन या चार–पांच लोग एक साथ खाना खाते आराम से देखे जा सकते हैं और जब कोई सामूहिक भोज का आयोजन हो तो ये एक आम बात है | हर संस्कृति में खाना परोसने कि भी अपनी अलग ही कला होती है और खाने कि भी, थाली के बीचों बीच ढेर सारा भात रखा गया था, साथ में एक प्लेट में अलग से कुछ हरे पत्तों से बनी सब्जी थी, दाल थी, आलू कि चटनी थी जिसे बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश में आलू चोखा भी कहा जाता है लेकिन इसे में आलू चटनी कहना ज्यादा उचित सझूंगा क्योंकि यहाँ आलू को सरसों के तेल व खूब सारी लाल मिर्ची के साथ तैयार किया गया था और बहुत ज्यादा तीखा था, मणिपुरी लोग अपने भोजन में लाल मिर्ची का ज्यादा उपयोग करते हैं, भात एकदम शुद्ध जैविक चावलों से बना था जिसकी खुशबु ही गजब कि थी, बिना सूखी मछली के यहाँ के खाने का स्वाद उत्तर भारत से कोई ज्यादा अलग नही लगा मुझे अभी तक जो हमे परोसा गया था उसके आधार पर ही में ये कह रहा हूँ, भोजन से निपटने के बाद मुझे पता चला कि अभी शादी से पहले एक और रस्म बाकि है जो थोड़ी देर में शुरू होगी, जिसको पीबा ले-लाँगबा कहा जाता है, यह रस्म हेइजिंग पोट के ठीक बाद कि रस्म है जो विवाह से पूर्व की जाती है, जिसमे लड़की के घर से कुछ लोग लड़के वालों को विवाह का औपचारिक निमंत्रण देने उसके घर आते हैं | 

रस्म कि तैयारियां पूर्ण हो चुकी थी अब इतजार था तो अतिथियों का, मुझे उम्मीद थी कि शायद लड़की कि फॅमिली से काफी लोग आयेंगे लेकिन वहाँ से केवल एक व्यस्क व्यक्ति एक 5-6 साल के बच्चे के साथ पहुंच थे, बच्चे को देख कर मुझे लगा था कि शायद ये महाशय बच्चे को उसके साथ चलने कि जिद के कारण लेके आए होंगे लेकिन में एकदम गलत था, असल में पीबा ले-लाँगबा कि रस्म में आज उसकी ही अहम् भूमिका थी, इस रस्म में लड़की का छोटा भाई लड़के को अपनी बहन से शादी करने के लिये तय तिथि पर घर आने का औपचारिक निमंत्रण देता है और ये महाशय दुल्हन के छोटे भाई थे | अब वक़्त था रस्म को शुरू करने का, जिस कमरे में रस्म अदा कि जानी थी उसमे बैठने के लिए तीन आसन लगाए गये थे, बिसेश्वर दा (दुल्हा), उनकी माँ और बड़े भाई को उस कमरे में बुलाया गया, कमरे के बीचों बीच जो आसन था उसमे बिसेश्वर दा को बैठाया गया, उनकी दांई ओर उनके तामो यानि बड़े भाई और बाँई ओर उनकी इमा यानि माँ को बिठाया गया, लड़की का भाई केले के पत्तों से बनी छोटी सी कटोरी में कुछ कुंदु यानि चमेली के फूल और तामुल लेकर कर सबसे पहले बिसेश्वर दा (दुल्हे) के पास जाता है, जिसे दुल्हे द्वारा ग्रहण करने का मतलब है कि निमंत्रण को स्वीकार कर लिया गया है, बिसेश्वर दा को भला क्या आपत्ति होनी थी ये तो बस औपचारिकता भर थी शादी कि सारी सेटिंग तो पहले ही हो चुकी थी, उन्होंने भी बच्चे के हाथ से कुछ कुंदु उठाकर अपने कान में खोंस दिया फिर लड़की का भाई उनको तामुल भेंट करता है जिसे वो स्वीकार करके अपने पास रख लेता है, इसके बाद लड़की का भाई बिसेश्वर दा के बड़े भाई व माँ के पास कुंदु व तामुल लेकर जाता है, तीनो का अपने पास तामुल रख लेना का अर्थ है कि सबको तय दिन का निमंत्रण स्वीकार है, वैसे यह केवल औपचारिक रीत है विवाह का दिन दोनों परिवारों कि सहमति से पहले ही तय कर ली जाती है | इस रस्म के आखिर में बिसेश्वर दा के बड़े भाई दुल्हन के भाई को शिष्टाचार के रूप में कुछ पैसे देते है और वो लोग फिर वापस अपने घर लौट जाते हैं | हाँ एक और बात यहाँ भी सारी रस्मों में पंडित कि भूमिका महत्वपूर्ण होती है | 

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अब आज कि सारी रस्मे पूरी हो चुकी थी अतः अब हम घुमने के लिए आज़ाद थे, मै, भास्कर दा इबोमचा भैया के साथ उनकी कार में घुमने निकल गए, घुमने क्या असल में यहाँ का खास पकोड़ा खाने जिसे यहाँ बरा कहते हैं, भैया को जूते पहनने थे तो वो हमको लेकर सबसे पहले अपने घर गए, घर में घुसते ही हमारी नज़र उन महिलाओं पर पड़ी जो हाथ से चलने वाली मशीन पर कुछ बुनने में व्यस्त थी, मै और भास्कर दा सीधे उनके पास जा पहुंचे और भास्कर दा उनसे कुछ पूछने लगे फिर उन्होंने मुझे बताया कि ये लोग एन्नाफी (ennaphi) – महिलाओं द्वारा ऊपर से ओढे जाने वाला वस्त्र बुन रही हैं जिसे तैयार करने में काफी समय लगता है और ये काफी महंगा भी है, इसे महिलाओं द्वारा किसी खास मौके पर ही पहना जाता है |

Women weaver: weaving Ennaphi.  Click here for more images Jewel of India (The Land of Jewels)
जल्दी ही इबोमचा भैया तैयार होकर बाहर आये और फिर हम चल दिये पकोड़ा खाने | पहले हम थोडा घुमे फिर हम उस दुकान पर जाकर रुक गए जहाँ हमको पकोड़ा खाना था, सड़क किनारे लड़की से एक दुकान बनी थी जिसमे दो महिलाएं काम कर रही थी, वो दोनों इस दुकान कि कर्मचारी भी थी और मालकिन भी, जिस हिसाब से दुकान में भीड़ थी और पूरे इम्फाल में जितनी पकोड़े कि दुकान थी उनको देखकर मैंने भास्कर दा से कह ही दिया कि यहाँ के लोग पकोड़े खाने के बड़े शौक़ीन हैं तो वो बोले कि नीरज तुम ये समझो कि यहाँ कि मिठाई पकोड़ा ही है | इबोमचा जी ने मणिपुरी में उन महिलाओं से दो प्लेट पकोड़े तैयार करने को बोला, पकोड़े बनाने कि प्रक्रिया पूरी तरह उत्तर भारतीय थी लेकिन थोडा इंतज़ार करने के बाद जब दो बड़ी गहरी प्लेटों में हमारे लिए पकोड़े परोसे गए तो मुझे उत्तर भारत व मणिपुर में पकोड़े खाने के तरीकों में फर्क महसूस हो रहा था | पूरी प्लेट सूखी मटर के झोल से भरी थी और प्लेट के बीच में पकोड़े रखे थे जिनके ऊपर कटा प्याज़ व कुछ हरे पत्ते थे जो दिखने में हुबहू लहसुन के छोटे पौधे के आकर के थे और खाने में भी कुछ वैंसा ही स्वाद था लेकिन ये लहसुन के पौधे नही थे ये केवल मणिपुर में ही होता है जोकि कि हर्ब्स कि श्रेणी में आता है, उस पत्ते का नाम तो मुझे ज्यादा देर तक याद नही रहा लेकिन हाँ उन पकोड़ों का स्वाद मुझे काफी देर तक ललचाता रहा | पकोड़ों के साथ लाल चाय पीने का मज़ा ही कुछ और था, में और भास्कर दा एक प्लेट पकोड़ों कि हजम कर चुके थे, वैसे भी भास्कर दा पकोड़ों के बड़े शौक़ीन हैं, इबोमचा जी ने दो और प्लेट का आर्डर दिया और इस बार थोडा दूसरे टाइप का पकोड़ा खाने को मिला, दूसरी बार में मेरा पेट भर चूका था, मै अब और खाने की स्थिति में नही था मेरे बार बार मना करने के बावजूद भी इबोमचा जी ने तीसरी बार दो प्लेट का आर्डर दे दिया, लेकिन मै तो अपने हाथ खड़े कर चुका था, इबोमचा बोले तुम्हारा पेट भर गया तो क्या हमारा भी भर गया ? खैर पकोड़ो कि दावत खत्म होने के साथ ही आज का दिन भी खत्म हो चुका था और इबोमचा अब हमे वापस घर छोड़ने जा रहे थे | 

घर पहुंचे तो बिसेश्वर दा ने बोला कि चलो बाज़ार चलते हैं, मै, भास्कर दा, अबुंग, साना और बिसेश्वर दा स्थानीय बाज़ार में कुछ जरूरी सामान खरीदने चले, चलते –चलते जब पकोड़ों कि दावत का सबको पता चला तो सबका मन पकोड़े खाने का हुआ, मुझे बताया गया कि यहाँ के बाज़ार में थोडा अलग तरह का पकोड़ा मिलता है उसे भी खाकर देखो, मै तो पहले ही ओवरलोडेड हो चुका था इसलिए मना कर दिया लेकिन आप लोग खाइए इतना बोलकर में थोडा किनारे हो गया, भास्कर दा और बिसेश्वर दा अकसर इस दुकान पर पकोड़ा खाने आते थे, इसलिए उनकी जुबान पर यहाँ का स्वाद चढ़ा था, जब हम दुकान के अन्दर घुसे तो मुझे यहाँ भी एक महिला मुख्य भूमिका में नज़र आयी जो इस दुकान के मालकिन से लेकर कर्मचारी सब कुछ थी, बाकि सब लोगों ने पकोड़ों का आनंद ले रहे थे और मै मन ही मन सोच रहा था कि भास्कर ने सही कहा था कि पकोड़ा यहाँ कि मिठाई जैसी है जो हर बाज़ार, हर गली में मिल जाएगी.  घर लौट कर हमने अगले दिन कि प्लानिंग बनायीं कि कल हम क्या करेंगे, मुझे और भास्कर दा को कल कल कुछ लोगों से मिलने जाना था, और कल हम पूरा दिन फ्री थे तो आराम से घूम सकते थे, इसलिए हमने अगले दिन सुबह 9 बजे तक घर से निकलने कि योजना बनाकर आज के दिन कि इति श्री की |

जब तक मै तीसरे दिन कि यात्रा लिखता हूँ तक आप मेरी पूर्वोत्तर यात्रा को शुरुआत से 4 भागों में पढ़ सकते हैं 1- पूर्वोत्तर यात्रा कि भूमिका, 2- पूर्वोत्तर यात्रा: चल पड़ा पूर्वोत्तर कि ओर 3- एअरपोर्ट से इरिलबुंग तक का सफ़र और मणिपुरी युद्ध कला हुएन लाल्लोंग’ से परिचय 4- पूर्वोत्तर यात्रा: मणिपुर में पहला दिन, पौना बाज़ार और हेजिंग्पोट की तैयारियां...... को विस्तार से पढ़ सकते हैं |  और यदि आप मेरी मणिपुर यात्रा के दौरान लिए गए अन्य चित्रों को देखना चाहते हैं तो यहाँ Jewel of India (The Land of Jewels) क्लिक करें |



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Tuesday, March 21, 2017

पूर्वोत्तर यात्रा : मणिपुर में दूसरा दिन व हेइजिंगपोट (Heijingpot) की रस्म

रात को सोने से पहले भास्कर दा ने मुझे बता दिया था कि अगले दिन सुबह 10 बजे के करीब हम लोगो को दुल्हे कि तरफ से दुल्हन के घर हेइजिंगपोट की रस्म (औपचारिक सगाई) में जाना है, इसलिए में सुबह आराम से 8 बजे तक उठा | आज का हमारा पहला एजेंडा था नहाकर तैयार होना, उन दिनों मणिपुर में ठण्ड बहुत ज्यादा तो नही थी लेकिन ठन्डे पानी से नहाया जा सके ऐसा भी नही था और भास्कर दा पहले ही मेरी गरम पानी कि उम्मीदों पर पानी फेर चुके थे, इसलिए मैंने उसके लिए कोई कोशिश भी नही कि और ठन्डे पानी से ही नहा लिया, जिसके बाद हमको जाना था नास्ता करने और हमको नास्ता करवाने जिम्मेदारी दी गयी इबोमचा जी को जोकि हमसे उम्र में काफी बड़े थे लेकिन उनको देख कर कोई भी उनकी उम्र का अंदाज़ा नही लगा सकता था और हम उनको भैया कह कर पुकार रहे थे | उनसे पहले दिन ही मेरी 2 मिनट कि मुलाकात हुई हो चुकी थी इसलिए वो मेरे लिए एकदम नए नही थे, हम उनके साथ पास के बाज़ार में नास्ता करने गए, मुझे लगा कि हमारे लिए नाश्ते कि व्यवस्था बाहर इसलिए कि गयी थी कि शायद इन लोगों ने सोचा होगा कि हम रोटी खाने वाले लोग सुबह चावल वाला मणिपुरी नास्ता पसंद ना करें, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नही था, असल में उन्होंने ऐसा इसलिए किया था कि आज घर के सभी लोग हेइजिंगपोट कि तैयारी में व्यस्त थे और घर में फ़िलहाल खाने को कुछ नही बनने वाला था |

मुझे थोडा आश्चर्य भी हुआ कि आज विवाह कि पहली रस्म है और घर में कोई मेहमान भी नज़र नही आ रहे थे और ना ही खाने-पीने कि कोई व्यवस्था ही, फिर सोचा कि शायद हम कुछ लोग ही आज इस रस्म के लिए जायेंगे और बाकि लोग शायद शादी में जायें | हम जब नास्ता करके वापस घर आ रहे थे तो रास्ते में कुछ पारम्परिक वेश-भूषा में महिलाओं टोली नज़र आयी तो भास्कर दा बोल पड़े शायद ये सब हेइजिंगपोट के लिए तैयार होकर घर कि तरफ ही आ रहे हैं और भास्कर दा का अंदाज़ा सही था, वो सारी महिलाएं उसी घर में आ रही थी, धीरे-धीरे संख्या बढ़ने लगी थी और अब मुझे समझ आ गया था कि सगाई में हम कुछ लोग नही बल्कि लगभग 50 -60 लोग जाने वाले हैं |

हेइजिंगपोट (Heijingpot) रस्म कि तैयारियां लगभग पूर्ण हो चुकी थी और अब समय था लड़की के घर के लिए निकलने का, सारी महिलायें घर के सामने बने मंदिर के मंडप में जाकर एक लाइन से खड़ी हो गयी, एकदम ऐसे जैंसे हम स्कूल में प्रार्थना के लिए लाइन बना के खड़े होते थे अनुशासन के साथ, पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार सबसे आगे एक छोटी लड़की को खड़ा किया गया जिसके सिर पर पुजारी द्वारा फूल व कुछ शगुन के सामान से भरी एक टोकरी रखी गयी, जिसे सफ़ेद कपड़े से पैक किया गया था, जिसे मणिपुरी में लेइचन्दोन (Leichondon) कहते हैं और उस छोटी लड़की को पुबी लेइसबी (Pubi leisabi) कहते है, 
Heijingpot: पुबी लेइसबी (Pubi leisabi)
और फिर उसके पीछे अन्य महिलाओं को अपने सिर पर फिन्गैरुक (Phingairuk) या हेइजिंग खाराई (Heijing Kharai) (बांस से बनी खुबसूरत टोकरियाँ) रख कर चलना था, इन टोकरियों में 7 प्रकार के फल - इन सात फलों में आंवला सबसे महत्वपूर्ण होता है जिसे मणिपुरी में हेइक्रू (Heikru) कहते हैं, इस रस्म में यदि हेइक्रू नही है तो बाकि फलों का कोई औचित्य नहीं होता है और यदि किसी कारण ये फल उपलब्ध नही है तो उसके पेड़ की शाखाएं प्रयोग कि जाती हैं, फलों के अलावा अन्य टोकरियों में मिठाई, चावल, दुल्हन के लिए कपड़े, श्रृंगार का सामान, गहने आदि होते हैं | एक टोकरी में पूर्वजों के देवताओं व एक में स्थानीय देवताओं के लिए फल रखे जाते हैं | ये सारा सामान महिलाएं अपने सर पर लेकर लड़की के घर जाती हैं, अगर घर सामने ही होगा तो पैदल नही तो घर से निकल कर गाड़ी तक सिर में सामान ले जाते हैं फिर लड़की के घर के सामने गाड़ी से उतर कर अपने सिर में रख कर पूजा के मंडप तक लेके जाती हैं |


ये सब देख कर ही मुझे अंदाज़ा लग गया था कि यहाँ की संस्कृति, वैवाहिक रीति-रिवाजों, उनकी रस्मों में महिलाओं का पुरुषों के समान ही योगदान होता है, आज हेइजिंगपोट में जाने के लिए   एक बस केवल महिलाओं से भरी थी, इसके अलावा कुछ और गाड़ियों में भी उनका ही वर्चस्व था, आज मेरा यह पहला अनुभव था जब किसी विवाह कि रस्म में जाने के लिए पुरुषों के मुकाबले महिलाओं कि संख्या दुगनी थी और संख्या को छोड़ दें तो भारत के अन्य राज्यों कि तरह ही यहाँ भी आकर्षण के केंद्र में महिलाएं ही थी, सारी महिलाएं अपनी आकर्षक पारंपरिक वेश-भूषा में थी | यहाँ एक और बात काफी रोचक थी कि वो ये कि सारी महिलाएं एक ही रंग-रूप कि फनेक (Fanek) - कमर से नीचे का वस्त्र और एन्नाफी (ennaphi) -ऊपर से ओढने वाला वस्त्र पहनी थी जोकि सूती या फिर रेशम से खुद के द्वारा घर में तैयार किया गया था और सारे पुरष सफ़ेद रंग का कुर्ता व धोती पहनते थे, इसलिए भास्कर दा ने मुझसे कहा कि वैसे तुम बाहर से आये हो तो आज बिना धोती कुर्ते के जा सकते हो लेकिन अगर तुम को फोटोग्राफी करनी है और मंडप के अन्दर जाना है तो तुम मेरा कुर्ता पजामा पहन लो, वर्ना लोग बुरा मान सकते हैं और भला मुझे इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी मैंने भी झट से उनके कुर्ते-पजामे पर हाथ लपक लिया, आखिर दिल्ली से मै उनके कुर्ते पजामे के सहारे ही यहाँ कि शादी में शामिल होने आया था क्योंकि मुझे यहाँ कि शादी में ड्रेस कोड वाली बात पहले से ही मालूम थी |   

घर से निकलने के 20 मिनट बाद ही हम लड़की के घर पहुँच गए थे, घर के आंगन में एक मंडप बना था और मंडप के बीचों-बीच एक गमले में तुलसी का पौधा (मणिपुर के मैतेयी समुदाय में तुलसी का बहुत बड़ा महत्व है, जिसका ब्लॉग में अलग से चर्चा करूँगा) रखा गया था, जिसके चारों ओर बाहरी किनारे पर बैठने कि व्यवस्था थी जहाँ वर पक्ष व कन्या पक्ष के पुरूषों को बैठा दिया गया और वर पक्ष कि महिलाओं के सिर से सामान उतार कर मंडप में रखे गए तुलसी के चारों ओर रख दिया गया |


वर पक्ष कि सभी महिलाओं को मंडप के बाहर पास में ही बने एक ऊँचे स्थान पर बिठा दिया गया, जिसके ठीक विपरीत कन्या पक्ष कि महिलाओं को बैठाया गया था | जब सब चीजें सही स्थान में पहुँच गयी तो स्थानीय पंडित ने पूजा शुरू कि जिसमे वो वर-वधु के कुल देवताओं, पित्रों आदि को निमंत्रित करते हैं और फिर वर-वधु के अभिभावक (यदि लड़के व लड़की के पिता जीवित नही हैं तो उनके घर से कोई सबसे बड़ा आदमी पिता कि जगह पूजा कि सारी रस्में पूर्ण करता है) को मंडप के बीच में पूजा के लिए बुलाया |

जिसमे दोनों ने अपने पूर्वजों, देवताओं को याद करते हुए, फल व चावल भेंट किया और साष्टांग प्रणाम किया, इसके बाद दोनों अभिभावक सबके सामने विवाह करवाने कि औपचारिक घोषणा कि, ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि सबके सामने अगले कुछ दिनों में होने वाली शादी को सामाजिक सहमति मिल सके, इसके बाद मंडप में बैठे सभी पुरुषों ने एक दूसरे को आदर भाव प्रदर्शित करते हुए झुक कर प्रणाम किया | फिर पंडित जी सब लोगों को फूल दिया, इसके बाद वधु पक्ष कि और से कुछ लड़कियां सबके लिए लाल चाय लेकर आयी, जिसे पीने के बाद हम सभी लोग वापस घर आ गये |


मेरे लिए विवाह कि इस पहली रस्म “हेइजिंग पोट-औपचारिक सगाई” में कुछ बातें बड़ी गौर करने वाली थी जिसमे सबसे पहली बात ये कि यह पूरी रस्म वर-वधु कि अनुपस्थिति में सम्पन्न होती है, दूसरा यहाँ के लोग अपनी पारंपरिक रस्मों के दौरान किसी भी तरह का शोरगुल पसंद नही करते, वहां मंडप में बैठा कोई भी व्यक्ति आपस में ना तो कोई बात कर रहा था ना ही वहां किसी भी प्रकार का संगीत बज रहा था, ना ही हमारे यहाँ कि तरह डी जे का शोरशराबा था, सब लोग एक दम शांत भाव से बैठकर मंडप कि तरफ नज़रें गढ़ायें बैठे थे, खैर आज कि रस्मों को देख कर मुझे लग गया था कि मुझे आगे कुछ और नए अनुभव प्राप्त होने वाले हैं तो उनके मै भी तैयार हो चूका था, जिनकी चर्चा मै अपने पूर्वोत्तर यात्रा के अगले भाग में करूँगा .......... तब तक आप मेरी पूर्वोत्तर यात्रा को शुरुआत से 4 भागों में पढ़ सकते हैं 1- पूर्वोत्तर यात्रा कि भूमिका, 2- पूर्वोत्तर यात्रा: चल पड़ा पूर्वोत्तर कि ओर 3- एअरपोर्ट से इरिलबुंग तक का सफ़र और मणिपुरी युद्ध कला हुएन लाल्लोंगसे परिचय 4- पूर्वोत्तर यात्रा: मणिपुर में पहला दिन, पौना बाज़ार और हेजिंग्पोट की तैयारियां...... को विस्तार से पढ़ सकते हैं |  और यदि आप मेरी मणिपुर यात्रा के दौरान लिए गए अन्य चित्रों को देखना चाहते हैं तो यहाँ Jewel of India (The Land of Jewels) क्लिक करें |

Tuesday, March 14, 2017

पूर्वोत्तर यात्रा: मणिपुर में पहला दिन, पौना बाज़ार और हेजिंग्पोट की तैयारियां......

जब हम घर के अन्दर पहुंचे तो अन्दर कुछ युवा मिठाई के डिब्बे तैयार कर रहे थे, ये सारे लोग मेरे लिए नए थे इसलिए भास्कर दा ने सबके साथ मेरा परिचय करवाया | अबुंग कुछ लोगों को लेकर पौना बाज़ार जाने वाला था, मैंने भी जाने का आग्रह किया तो किसी को कोई आपत्ति न हुई, लेकिन अबुंग किसी का इंतजार करने को बोल रहा था और तब तक खाना खाके निपट जाने कि तैयारी में था, मुझे भी भूख लगी थी क्योंकि सुबह से कुछ खाया नही था, लेकिन जैसे ही हम खाना खाने के लिए आगे बढे अबुंग ने कहा तामो (मणिपुरी में बड़े भाई को तामो कहा जाता है) आ गया, तो हम खाना छोड़कर बाज़ार के लिए निकल गए, हम पांच (मै, अबुंग, साना, काइकू और इंदु दीदी) लोग एक मारुती 800 कार में जाके बैठ गए, मै इम्फाल का बाज़ार, यहाँ शाम को लोगों कि दिनचर्या देखने के लिए उत्सुक था, लगभग एक किलोमीटर चलने के बाद अबुंग ने एक पान कि दुकान के सामने गाड़ी रुकवाते हुए कहा कि जरा इसमें पेट्रोल भरवा देते हैं, आपको भले ही ये पढ के आश्चर्य हो होगा कि पान कि दुकान में क्या कोई पेट्रोल भरवाता है ? लेकिन मुझे थोडा सा भी आश्चर्य नही हुआ क्योंकि मुझे मणिपुर के हालात अच्छे से पता थे और उन दिनों मणिपुर किस स्थिति से गुजर रहा है ये में अच्छे से जानता था, पिछले तीन महीने से देश का मणिपुर राज्य एक उग्रवादी संगठन के द्वारा आर्थिक नाकेबंदी झेल रहा था, यहाँ के सारे पेट्रोल पंप सूखे कुंवे कि तरह हो गये थे और राज्य सरकारें अपनी सत्ता सुख में व्यस्त थी, ताज्जुब तो ये कि केंद्र सरकार भी केवल मीडिया के माध्यम से बयान बाज़ी में लगी थी, मार्च में मणिपुर  में चुनाव होने थे अतः केंद्र सरकार भी इसका राजनीतिक फायद उठाना चाह रही थी, क्योंकि राज्य में विपक्षी सरकार थी, खैर राजनीतिक फायदे के लिए सरकारें किसी भी हद तक जा सकती है, अबुंग जब तेल खरीदने के लिए गाड़ी से उतरा तो मेरा ध्यान दुकान में चिपके एक प्रिंट पर गया जिसमे लिखा था “इलेक्ट्री रिचार्ज यहाँ उपलब्ध” है, मुझे लगा कि शायद यहाँ लाइट कि समस्या रहती होगी तो ये लोग बैट्री से फ़ोन वगैरह  चार्ज करते होंगे लेकिन ये बात मेरे गले नही उतर रही थी तो मैंने साना को पूछ लिया, जब उसको समझ नही आया कि मै क्या जानना चाहता हूँ तो मैंने उसे दुकान कि तरफ इशारा करके पूछा कि वो जो लिखा है इसका मलतब क्या ? तब उसने मुझे धीमे स्वर और धीरे-धीरे हिंदी में बताया कि यहाँ अब घरों में बिजली आपूर्ति पूर्व भुगतान यानि प्री पेड़ के आधार पर कि जाती, आपके खाते में जितने पैंसे होंगे आप उतनी ही बिजली प्रयोग कर सकते हो, मेरे लिए तो ये एकदम नयी और आश्चर्य कि बात थी क्योंकि में जो देश कि राजधानी में रहता हूँ यहाँ अभी तक ऐंसा सिस्टम चालू करने का विचार ही चल रहा है और मणिपुर  में ये लागु भी हो गया है, मैंने साना और अन्य साथियों को मणिपुर में बिजली कि उपलब्धता के बारे में पूछा तो वो बोले जब से सरकार ने प्री पेड सिस्टम किया यहाँ बिजली चोरी काफी हद तक समाप्त हो गई है और बिजली चोरों के ऊपर सख्त कार्रवाई कि जाती है, जिससे यहाँ अब बिजली कि समस्या पहले जैसी नही रही, बाद में इस बात कि पुष्टि एक विद्युत विभाग के एक अधिकारी ने भी कि थी, जिसमे उन्होंने कहा था कि जब से मणिपुर में नयी पीढ़ी सरकारी जॉब में आयी है यहाँ काफी परिवर्तन आया है क्योंकि ये पीढ़ी बाहर से अच्छी शिक्षा लेकर अपने राज्य में कुछ अच्छा काम करने कि कोशिश में लगे हैं, हांलांकि जब आम जानता किसी बात कि पुष्टि कर देती है तो फिर किसी अधिकारी कि जरूरत नही पडती है |

गाड़ी में तेल डलवाने के बाद अबुंग गाड़ी में बैठ गया और हम चले पड़े थे अपनी मंजिल कि ओर...कुछ ही देर में हम उस बाज़ार में पहुँच गए थे जहाँ से हमे मिठाई लेनी थी, गाड़ी से उतरने के बाद हम सीधे उस दुकान कि ओर बढे जहाँ से हमे मिठाई लेनी थी लेकिन दुकान वाले ने हमे निराश कर दिया और कहा कि आपका आर्डर अभी तैयार नही है एक घंटा लगेगा ये सुनकर सच मानिए मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, क्योंकि हम खाना छोड़कर यहाँ आये थे, और ये महाशय हमे और इंतज़ार करवाने वाले थे, अबुंग समझ गया था कि मुझे बहुत जोरो कि भूख लगी है, उसने मुझे कहा भी कुछ खा लो, लेकिन मुझे अकेला कुछ खाना अच्छा नही लगा सो मना कर दिया और फिर घर से निकलते समय मै भास्कर दा को बोल के आया था कि घर लौटकर साथ में खाना खायेंगे, समय काटने के लिए हम थोडा सा बाज़ार में घुमे और वापस उस दुकान में अड्डा जमाकर कर बैठ गए, हांलांकि कि दुकान में अकेला मैं ही हिंदी भाषी नही था वहां बहुत से दिहाड़ी वाले हिंदी भाषी मजदूर थे और दुकानदार खुद भी हिंदी भाषी था, लेकिन मेरा परिचय इन चार मणिपुरियों से था जिनकी मणिपुरी गप्पों के बीच में मै अपने एक हाथ में मोबाइल पर गूगल मेप व दूसरे हाथ से चाय के गिलास कि चुस्कियों में व्यस्त था, काईको और अबुंग को लगा कि शायद मै उनकी मणिपुरी में चल रही बातों से उब रहा हूँ तो वो दोनों बीच-बीच में मुझे हिंदी में समझा देते थे कि वो क्या बात कर रहे हैं या फिर वो हिंदी में बात करने कि कोशिश करते लेकिन मैंने उन्हें कहा कि नही आप लोग मणिपुरी में ही बात कीजिये, मै आपकी बातों को ध्यान से सुन रहा हूँ ताकि मुझे मणिपुरी के कुछ शब्द समझ में आ सके | चाय पीते हुए मैंने अबुंग से पूछ लिया कि हम जिस बाज़ार में बैठे हैं उसे क्या कहते हैं ? वैसे मैं बाज़ार का नाम अपनी गूगल कि करेंट लोकेशन से जान गया था लेकिन सही नाम व उसके उच्चारण के लिए मैंने अबुंग से पूछ लेना उचित समझा | जिस बाज़ार को हमने 10 मिनट में घूम लिया था उसका नाम था पौना बाज़ार और जिस शख्स के नाम से आज ये बाज़ार जाना जाता है उसकी शख्सियत व उनके नाम कि कहानी बड़ी ही रोचक है |

पौना बाज़ार को ये नाम मिला था स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पौना ब्रजबासी के कारण जो 1891 में अंग्रेजों के साथ खोंगजोम के युद्ध में वीर गति को प्राप्त हो गए थे | वे इतने पराक्रमी व युद्ध कुशल ही तो थे कि 58 वर्ष की आयु में मणिपुरी सेना से सेवानिवृत होने के बावजूद भी उनको 1890 में मेजर के पद पर पुनः नियुक्त किया गया था | वो मणिपुरी मार्शल आर्ट (जिसे आज थांग-टा के नाम से भी जाना जाता है) के माहिर थे, तलवार बाज़ी में उनका कोई मुकाबला नही कर सकता था, मणिपुरी सेना में केवल उन्हें ही पंजाब जाकर कुछ अन्य युद्ध कौशल सीखने के लिए भी चुना गया था | 1891 में जब मणिपुर पर अंग्रेजों ने अपना कब्ज़ा ज़माने के लिए म्यांमार कि दिशा से इम्फाल कि ओर बढ़ना शुरू किया तो उनको रोकने के लिए पौना ब्रजबासी के नेतृत्व में मणिपुरी सेना को खोंगजोम भेजा गया जोकि इम्फाल से 36 किमी कि दूरी पर भारत-म्यांमार के रास्ते में है | 23 अप्रैल 1891 को अंग्रेजों के साथ युद्ध शुरू हुआ, तीन दिन तक चले इस युद्ध में पौना ब्रजबासी अपनी सेना के साथ शहीद हो गये | उन शहीदों की याद में प्रत्येक वर्ष 23 अप्रैल को खोंगजोम दिवस  मनाया जाता है, इसमें गानों के माध्यम से पौना ब्रजबासी के गौरवशाली इतिहास को प्रस्तुत किया जाता है जिसे खोंगजोम पर्व कहा जाता है |

लेकिन अगर में कहूँ कि जिस शख्स के नाम से लोग आज इस बाज़ार को जानते हैं उनका असली नाम पौना ब्रजबासी नही था तो आप क्या कहेंगे, यही कि फिर उनका असली नाम क्या था ? पोनम नवोल सिंह ! जी हाँ यही था उनका असली नाम, लेकिन वो पौना ब्रजबासी कैंसे हो गये ? दरअसल इसके पीछे भी एक छोटी सी कहानी है, असल में पोनम नवोल सिंह कुछ वर्षों तक वृन्दावन में रहे थे जिस कारण उनके नाम के साथ ब्रजबाशी (बृजवाशी) जुड़ गया था और पोनम को लोग पौना उच्चारित करने लगे, जिस कारण धीरे-धीरे ये पौना ब्रजबासी के नाम से प्रचिलित हो गये, और भारत में तो ये प्रथा है ही कि लोग एक दूसरे को उसके असली नाम से कम अन्य उप नामों से अधिक जानते हैं |

लेकिन मेरे सामने अब सवाल ये है कि जब तक इस बाज़ार का नाम पौना बाज़ार नही पड़ा था तब तक लोग इसे किस नाम से जानते थे ? और कब से इसे इस नाम से जाना जाने लगा ? सवाल कुछ और भी हैं जिनकी चर्चा किसी और भाग में करूँगा, यहाँ मै अपनी पूर्वोत्तर यात्रा पर वापस लौटता हूँ ................

आपको मै ये बताना तो भूल ही गया था कि हम पांच लोग पौना बाज़ार क्यों आये थे, असल में हम अगले दिन होने वाली विवाह कि एक महत्वपूर्ण रस्म हेजिंग्पोट में लड़की के घर ले जाने के लिए मिठाईयां खरीदने के लिए पौना बाज़ार आये थे | मुझे मणिपुर में बड़े-बूढों कि खाना खाने को लेकर कही गयी एक बात जीवनभर के लिये सबक लग रही थी और वो ये बात थी कि कभी भी थाली में रखे खाने को छोड़कर किसी काम के लिए घर से नही निकलना चाहिए वर्ना भूखे रह जाओगे, मेरे साथ उस दिन कुछ ऐंसा ही हुआ, मै खाना आकर खाने कि बात कहकर बाज़ार के लिए निकल गया था और बाज़ार से मिठाई लाने के बाद घर में सब लोग अगले दिन होने वाली विवाह कि रस्म कि तैयारियों में जुट गए थे और कोई भी खाने के लिए पूछ ही नही रहा था, मुझे लगा कि शायद विवाह कि उत्सुकता के कारण इन लोगों को भूख ही नही लग रही थी या ये लोग खाना खा चुके थे, खैर वजह जो भी रही हो पर मै तो भूखा ही था और इस इंतज़ार में था कि कब मुझे खाने के लिए आमंत्रित किया जायेगा, इधर भास्कर दा ने भी मुझे खाने के मामले में धोखा दे दिया था, क्योंकि वो शाम को कहीं बाज़ार से दबाके पकोड़ा खा चुके थे जिस कारण वो खाने के इछुक नही थे, बड़ी देर बाद आखिर हमे भोजन कक्ष में आमंत्रित किया गया | भोजन करने के पश्चात् हम कुछ लोग फिर से अगले दिन कि तैयारियों में जुट गए थे, उस तैयारी के दौरान मुझे एक बात समझ आयी कि मणिपुरी लोग लड़की के घर ले जाने वाले सामान को बड़े सलीके से ले जाते हैं, पहले मिठाइयों को छोटे डिब्बों में रखा गया फिर उनको बड़े डिब्बो में रख कर अच्छे से सजाकर पैक किया जा रहा था | काम कम होने के साथ-साथ लोग भी कम होते जा रहे थे, जिनका घर दूर था वो लोग घर के लिए निकल गए थे | काईको को घर बगल में ही था तो जब तक काम पूरा नही निपट गया वो तब तक वहां रुकी, लगभग रात के 12 बजे तक सारी पैकिंग हो चुकी थी और वो भी जाने कि तैयारी में थी लेकिन मैं तो पहले ही कामचोरी करके अपने सोने के लिए बिस्तर पर कब्ज़ा जमा चूका था | इस तरह मेरा मणिपुर का पहला दिन बिता |

पूर्वोत्तर यात्रा के अगले भाग में मै आपको अब मणिपुरी विवाह कि परम्पराओं रस्मों से रूबरू करवाऊंगा, तब तक आप मेरी पूर्व में लिख गयी पूर्वोत्तर यात्रा कि भूमिका, पूर्वोत्तर यात्रा: चल पड़ा पूर्वोत्तर कि ओर व एअरपोर्ट से इरिलबुंग तक का सफ़र और मणिपुरी युद्ध कला ‘हुएन लाल्लोंग’ से परिचय को विस्तार से पढ़ सकते हैं | तो मिलता हूँ जल्दी ही आपको अपने पूर्वोत्तर यात्रा के भाग भाग के साथ.......|

इम्फाल में 5 दिन का हमारा आशियाना 














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थौबल से वापस इम्फाल लौटने की घडी आ चुकी थी, जिस तरह हम थौबल आये थे उसी तरह वापस इम्फाल के लिए निकल पड़े, कुछ किमी की दूरी तय करने के बाद ...